9.2.16

How can a person survive 6 days under the snow as lansnayak Hanmanthappa did?


अपने 9 साथियों के बर्फ में दबकर मर जाने के बाद भी लांसनायक हमंथप्पा का सुरक्षित बचना किसी चमत्कार  से कम नहीं इस विषय में कुछ जानकारों का मत साथ ही जरुरत है वर्फ से सम्बंधित हादसों पर और काम की ताकि ठंढे प्रदेशों में जीवन को सुगम बनाया जा सके, इसे (लांस नायक हनमनथप्पा के बच जाने को) विज्ञान का अचंभा ही कहा जाएगा. हालांकि विज्ञान के पास इसका साफ़ जवाब नहीं है. हो सकता है जवान को कहीं से ऑक्सीजन मिल रही हो, हो सकता है कि वो बहुत फ़िट हों. ये कहना बहुत मुश्किल है कि कोBई व्यक्ति क्यों बच जाता है. यही वजह है कि राहतकर्मी कभी भी खोजबीन नहीं रोकते.

 इस घटना से साबित होता है कि शून्य से नीचे के तापमान पर जीवित रहने पर शोध होना चाहिए. ये समझना ज़रूरी है कि क्या कम तामपान मात्र से मौत हो सकती है? ऐसी दूसरी घटनाओं की भी जांच होनी चाहिए. इससे ये भी सवाल उठ सकता है कि ऊंचाई पर अगर व्यक्ति बेहद कम तापमान में रहे तो क्या वो बच सकता है? हमें इस बारे में पता नहीं है.
लंबे समय तक शून्य से नीचे के तापमान में रहने से दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है. यानि दिल तेज़ी से काम करता है और दिल की धड़कन रुकने का ख़तरा उत्पन्न हो जाता है. आज भी ऊंचाई पर ज़्यातादर मौतें हापो यानि हाई एल्टीट्यूड पल्मनरी इडीमा से होती हैं. इसमें व्यक्ति के फेफड़ों में पानी भर जाता है. इसका एक ही इलाज है कि व्यक्ति को नीचे ले जाया जाए. लेह में भारतीय सेना का एक आधुनिक अस्पताल है. अस्पताल में एक चैंबर है जहां आक्सीजन बहुत है. या तो हम पीड़ित व्यक्ति को वहीं रख देते हैं या उन्हें चंडीगढ़ भेज देते हैं. कई लोगों को हापो जल्दी हो जाता है. कुछ दवाइयां दी जाती हैं ताकि फेफड़ों में परिवर्तन न हो. जवानों की ट्रेनिंग होती है. इसके अलावा जवानों को बताया जाता है कि वो ख़ुद को ठंड के मुताबिक़ कैसे ढालें और क्या सावधानी बरतें. इस बारे में कई अध्ययन किए गए हैं.

इसके अलावा कई जवानों में एक्यूट माउंटेन सिकनेस की शिकायत होती है. आपने महसूस किया होगा कि पहाड़ों पर जाने के कारण कभी-कभी सिर में दर्द होता है. दरअसल ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होने के कारण मस्तिष्क पर दबाव बढ़ जाता है.
ठंड से एक और ख़तरनाक स्थिति पैदा हो सकती है - थ्रांबोसिस. दरअसल ज़्यादा ऊंचाई से शरीर में ख़ून का जमना बढ़ जाता है. ठंड से दिल में या मस्तिष्क में थक्का जम सकता है. उंचाई पर मृत्यु के कई कारण हो सकते हैं लेकिन व्यक्ति क्यों बच गया ये समझना मुश्किल होता है. इससे पता चलता है कि प्रकृति की 90 प्रतिशत बातें अभी भी हमें मालूम नहीं.

बहुत ठंड से ख़ून जम सकता है, उंगलियां गल जाती हैं, निमोनिया या इन्फ़ेक्शन हो जाता है. बहुत ठंड से गैंगरीन हो सकता है या शरीर का कोई हिस्सा सड़ जाता है.
इसी कारण सैनिकों के लिए लेह जैसी जगहों पर जाने के लिए निश्चित कार्यक्रम होता है. सैनिकों को आदेश होता है कि वो पहले दिन पूरा आराम करें. ज़्यादातर पर्यटक ऐसा नहीं करते. दूसरे दिन जवान मात्र लेह के भीतर उसी ऊंचाई पर घूम सकता है. लेह से ऊपर जाने के लिए अलग रूटीन तय होती है. नहीं

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