*ऊर्जा झटका और धीमी रफ्तार: ऐसा लग रहा है कि दुनिया ‘Stagflation की ओर बढ़ रही है?”*
वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर एक जटिल मोड़ पर है, जहाँ growth की गति धीमी पड़ती दिख रही है और महंगाई का दबाव बना हुआ है वर्तमान परिस्थिति संकेत करती है कि कि energy shocks और geopolitics अब आर्थिक दिशा को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। Middle East जैसे क्षेत्रों में तनाव बढ़ने से oil supply पर खतरा मंडराता है, और जैसे ही crude prices $100-120 प्रति बैरल के दायरे में पहुँचते हैं, transport, manufacturing और food production की लागत पर सीधा असर पड़ता है।
यही वह स्थिति है जहाँ economies को एक साथ दो समस्याओं का सामना करना पड़ता है—धीमी growth और ऊँची inflation।
इस परिदृश्य को और जटिल बनाता है central banks का dilemma। Inflation को काबू में रखने के लिए interest rates को ऊँचा बनाए रखना पड़ता है, लेकिन इससे borrowing महंगी हो जाती है और investment तथा consumption दोनों धीमे पड़ जाते हैं। परिणामस्वरूप global growth लगभग 2.5–3% के आसपास सीमित रहने का अनुमान है, जो पिछले दशक की तुलना में कमजोर है।
यह स्थिति classical stagflation की ओर इशारा करती है—जहाँ अर्थव्यवस्था आगे बढ़ने में संघर्ष करती है, लेकिन कीमतें नीचे आने को तैयार नहीं होतीं।
भारत इस वैश्विक दबाव से अलग नहीं रह सकता। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, इसलिए oil prices में हर उछाल का सीधा असर inflation और fiscal balance पर पड़ता है। जब crude महंगा होता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें, logistics cost और खाद्य महंगाई सब एक साथ बढ़ते हैं। इसके बावजूद, भारत की 6–6.5% growth rate और मजबूत domestic demand इसे अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर स्थिति में रखती है।
यही कारण है कि भारत इस global uncertainty में भी relatively resilient दिखाई देता है, लेकिन पूरी तरह immune नहीं है।
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े structural बदलाव की ओर संकेत करता है—अब अर्थव्यवस्था केवल demand और supply के traditional नियमों से नहीं चल रही, बल्कि geopolitics और energy security उसके केंद्र में आ गए हैं। आने वाले समय में वही देश स्थिर रह पाएंगे, जो growth के साथ-साथ external shocks को absorb करने की क्षमता भी विकसित करेंगे।
*LogicalNews Insight*
आज की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती growth हासिल करना नहीं है बल्कि उसे उस दुनिया में बनाए रखना है,जहाँ महंगाई और अनिश्चितता साथ-साथ चल रही हैं।
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