30.8.16

उत्तर प्रदेश की राजनीति और ब्राम्हणों की स्थिति


आदिकाल से सम्मान और ज्ञान के भूखे रहे ब्राम्हणों की पौराणिक महत्ता को दिखता इक छन्द-

ब्राम्हण सोखि समुद्र लिह्यो अरु,
ब्राम्हण साठि हजार को जारे।।
ब्राम्हण लात हनी हरि के उर
ब्राम्हण ही यदुबंश उजारे।।
ब्राम्हण पैठि पाताल छलौ बलि,
ब्राम्हण क्षत्रिन् के दल मारे।।
ब्राम्हण से जनि बैर करैयो कोई,
ब्राम्हण से परमेश्वर हारे।।


ब्राम्हण राजनीति-
उत्तर प्रदेश के 2017 में होने वाले चुनावों की गोटिया बिछने लगी है , बीजेपी ने पिछड़ो और दलितों को अपने पाले में करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है , लक्ष्मीकांत वाजपेयी को हटाकर केशव मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाना इस दिशा में पहली कड़ी थी केंद्र में हुए विस्तार में भी कृष्णा राज, रामदास आठवले व् अनुप्रिया पटेल को मंत्री बनाया जाना भी रणनीतिक एजेंडा के अंतर्गत ही हुआ, नरेंद्र मोदी, अमित शाह व संघ के भी बड़े नेता पिछड़ी जातियो से आते है इस लिए BJP को यूपी के जातीय दंगल में लगभग 48% वोट रखने वाले पिछड़ो पर भरोसा दिख रहा है,

यूपी का जातीय गणित- 
UP में स्पष्ठ रूप से पिछड़ी जातियो का बहुमत है NSSO के आकड़ो के अनुसार यूपी में 
ब्राम्हण- 13%
क्षत्री- 9%
वैश्य- 3%
यादव-10%
दलित-
(चमार/ जाटव के बिना)17%
जाटव/चमार- 4%
मुस्लिम 
(व अन्य अल्पसंख्यक)- 18% 
अन्य OBC - 26%
( कुर्मी-5% आदि)

( ये आंकड़े अलग जगह और अलग सर्वे में कुछ और भी हो सकते है)

ब्राम्हणों की स्थिति- 
अपनी बौद्धिक क्षमता और सभी विषयों में पारंगत माने जाने वाले ब्राम्हण राजनैतिक व सामाजिक रूप से सदैव प्रभावशाली रहे है स्वयं राजा न होकर भी राजसत्ता व समाज को संवृद्धि की दिशा देने हेतु ब्राम्हण सदैव योगदान देता रहा है,
विश्व की 10 सबसे प्रभावशाली कंम्यूनिटी हेतु TIME Magazine द्वार 2010 में किये गए सर्वे में ब्राम्हण 7वें पायदान पे था जबकी भारत की अन्य कोई समूह इसमें शमिल नहीं हो पाया, 
एशिया में 2nd (हान चाइनीज़ के बाद) और भारत में ब्राम्हण सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक, आर्थिक व राजनितिक समूह माना गया है,

कांग्रेस काल और राजनीति-

पूर्व में कांग्रेस की रणनीति सदैव ब्राम्हण+ दलित+ मुसलमान के गठजोड़ की रही है और इसी से कांग्रेस ने अब तक देश पर राज किया देखिये- (13+21+18= 52%) जो की सामान्य बहुमत से ज्यादा है क्षत्रिय भी कमोवेश ब्राम्हण के साथ ही रहे है या अलग भी रहे तो ब्राम्हणों के साथ इनके वोट आते रहे है परंतु राममंदिर व कांशीराम द्वारा 1990 के दसक में चले आंदोलनो के बाद ब्राम्हण बनियो या OBC की पार्टी मानी जाने वाली BJP की ओर झुक गया, मुस्लिम यादव नेता मुलायम के साथ और दलित जाटवों (चमारों) की पार्टी BSP को वोट देने लगा और तीनो ही सत्ता को अपने हाथो से गवां बैठे,

ब्राम्हणों का BJP से जुड़ाव-

राममंदिर आंदोलन के समय की परिस्थितियों में राजनीति ने जाति की बजाय धर्म आधारित पहचान का रुख किया और बीजेपी ने इसका फायदा लिया साथ ही तत्कालीन नेता अटल बिहारी बाजपेयी ब्राम्हणों के Icon थे जिनके नाम पर और हिन्दू सम्मान के लिए ब्राम्हण बीजेपी से जुड़ गया ।

बाद में बदली परिस्थितियां-

2004 में अटल जी के दिल्ली की सत्ता से हटने के बाद व यूपी में कांग्रेस के समाप्त होने के कारन ब्राम्हण खुद को सत्ता से दूर पाने लगा,
तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जोकि ब्राम्हणों से सहज चिढ़ रखते है के समय में हुए अत्याचारों से तंग आकर मुलायम को हटाने के लिए ब्राम्हण बसपा की नेता मायावती के साथ आया और 2007 में पूर्ण बहुमत से बसपा सत्ता में आई,

बसपा का कटु अनुभव-
2007 में मायावती को प्रदेश की सत्ता सौपने के बाद भी ब्राम्हण उपेक्षित ही रहा और बसपा नेता सतीश मिश्र उनके परिवार व् कुछ साथी वकीलों के आलावा बाकी ब्राम्हण अत्याचार ही सहते रहे साथ ही मायावती के भरस्टाचार से परेशान हो चुके समाज ने मायावती के विरोध का मन बनाया,

2012 में अखिलेश की सरकार और ब्राम्हण का योगदान-

मायावती के बसपा से मोहभंग होने और BJP व् कांग्रेस के शक्तिहीन होने की स्थिति में 2012 के चुनाव में ब्राम्हणों ने मुलायम व उनके बेटे अखिलेश का खुलकर विरोध नहीं किया जिस कारण वोट बटा कुछ वोट सपा ने भी पाया और अखिलेश सत्ता पाने में कामयाब हुए,

वर्तमान की स्थिति- 
अखिलेश की सरकार लगभग अपना कार्यकाल पूरा कर चुकी है और इस समय में पूरा सत्ता सुख यादवों ने ही भोगा है ऐसा लोगो का मानना है, सभी वर्गों की तरह ब्राम्हण भी सपा से नाराज है 2014 में मोदी को सत्ता में लाने वाला पंडित ही था ये मोदी अमित शाह सहित संघ को भी पता है पर मोदी की केंद्र सरकार में भी ब्राम्हण खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है और किसी अन्य विकल्प की तलाश में है,

स्वाती सिंह प्रकरण- ब्राम्हण और क्षत्रिय अलग दिखने के बाद वैसे ही आपस में जुड़े है जैसे माला और धागा , इस मामले में दयाशंकर की बेटी और पत्नी के मायावती का विरोध करने के बाद क्षत्रिय आंदोलित हुआ साथ ही ब्राम्हणों द्वारा मायावती का साथ देने का विकल्प भी लगभग समापत है ।

शीला दीक्षित के बाद आगे की रणनीति-
बीजेपी सहित अब सपा और कांग्रेस भी ब्राम्हणों के लिए विकल्प है क्योंकि शीला दीक्षित के नाम पर कांग्रेस को वोट दिया जा सकता है क्योंकि जब सभी पार्टियाँ OBC/SCST के पीछे भाग रही है तब कांग्रेस अपने पुराने वोटर के साथ खड़ी हुई दिख रही,

ऐसे में दूसरा विकल्प यदि बीजेपी धार्मिक मुद्दे को आगे करती है और साम्प्रदायिक गोलबंदी हो तो धर्म की रक्षा के कारण ब्राम्हण BJP को वोट देने के विकल्प पर विचार करेगा परन्तु राजनीति में सबकुछ आइस्थिर रहता है, आगे की रणनीति देखने वाली होगी, क्योंकि अभी तक BJP किसी प्रत्यासी का नाम घोषित नहीं कर पाई है ।

-TheLogicalNews

23.8.16

जाँच रिपोर्ट में बड़ा खुलासा दलित नहीं था रोहित वेमुला, मीडिया की विश्वसनीयता पर उठ राहे सवाल


 दिल्ली। 
इसी साल जनवरी में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में आत्महत्या करने वाला 26 वर्षीय रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला जिसको दलित दलित कहकर भारत के मीडिया चैनलों अखबारों और दलितों- मुसलमानों के रहनुमा बनने वाले कुछ साम्प्रदायिक नेताओं ने देश सर पर उठा लिया था लगने लगा की देश से सारे दलितों का सफाया हो गया उसी रोहित की जाति को लेकर नया खुलासा हुआ है जिसको लेकर दलित राजनीति का नया अध्याय लिखने की तैयारी हो रही थी, 

मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित जांच पैनल के मुताबिक रोहित दलित नहीं था।
एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रोहित अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से ताल्लुक नहीं रखता था। मानव संसाधन मंत्रालय ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के पूर्व न्यायधीश ए.के. रूपनवाल के नेतृत्व में एक पैनल ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूसीजी) को अगस्त के पहले सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सौंपी हैं।

रिपोर्ट में जो बात सामने निकलकर आई है वहीं बात पहले केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज और थावरचंद गहलोत भी कह चुके हैं। दोनों ही मंत्रियों ने कहा था कि रोहित अनुसूचित जाति से नहीं बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से था और तब रोहित की जाति वाडेरा बताई गई थी। इस आत्महत्या को तनाव पैदा करने के लिए जातिगत भेदभाव के एक मुद्दे के रूप में पेश किया जा रहा था।

इस केस में रोहित की जाति का साफ होना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसमें केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अप्पा राव का नाम भी एफआईआर में शामिल है। दोनों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत एक एफआईआर भी दर्ज हुई है।


इस बारे में जब जांच दल के मुखिया रूपनवाल से जब अंग्रेजी अखबार ने प्रतक्रिया मांगी तो उन्होंने रिपोर्ट सौंपने से इंकार नहीं किया और कहा, " मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दे सकता और आगे की जानकारी प्रशासन ही आपको देगा।" वहीं मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "इस मुद्दे पर आपको मुझसे ज्यादा जानकारी है। मैं पिछले पांच दिन से शहर से बाहर हूं और मैंने अभी तक रिपोर्ट नहीं देखी है। शायद यह रिपोर्ट यूजीसी को सौंप दी गयी हो। मैं इसे देखकर ही कोई जानकारी दे पाऊंगा।"


वहीं रोहित के भाई राजा ने जांच पैनल की इस टिप्पणी को खारिज करते हुए कहा है, "हम दलितों की तरह रहते हैं, हमारा पालन-पोषण दलित समुदाय में हुआ है। हां, मेरे पिता अन्य पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते थे, लेकिन जो भी हो हम इतना जानते हैं कि हम दलितों की तरह रहे हैं। हम सभी को जीवन में भेदभाव का सामना करना पड़ा है। इस बात का जिक्र रोहित ने अपने पत्र में भी किया था।"

गौरतलब है की मिडिया ने दलित मुद्दे को इतना जोरशोर से उठाया था की रोहित और ओवैसी दलितों के icon बन रहे थे, राहुल गांधी तक विश्वविद्यालय में जाकर रात गुजारे पर बिना सच्चाई जाने ।

इस प्रकरण के सामने आने के बाद भारत की मीडिया की विश्वसनीयता भी सवालो के घेरे में है की आखिर किस आधार पर आपलोग न्यूज़ चलाते है वो भी बिना किसी रिसर्च के, नेताओ की विश्वसनीयता को पहले से खतरे में है आखिर जनता किसपर भरोसा करे, किसी भी न्यूज़ नेटवर्क को चाहिए की बिना रिसर्च के न्यूज़ न चलाए,

इस विषय में LogicalNews पर आप भरोसा कर सकते है की हमने वेमुला की दलित पहचान पर हमेशा ही प्रश्नचिन्न लगाया था, आप इस भीड़ में LogicalNews पर अवश्य भरोसा कर सकते है।

-TheLogicalNews
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19.8.16

रिलाइंस lyf ₹199 का फ़ोन और Free Data पाने के लिए नकली वेबसाइट से लोग download कर रहे Virus


मुकेश अम्बानी ग्रुप की कम्पनी रिलायंस जिओ जो की अगस्त के आखिरी सप्ताह से अपनी मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर की सेवाएं देने की योजना बना रही के नाम पर कुछ फर्जी वेबसाईट अपना काम बना रही है और लोगो को अपनी वेबसाइट पर आकर नाम रजिस्टर करवाने के बाद फ्री Lyf का स्मार्टफोन और 6 माह का 4G डाटा देने का प्रलोभन दे रही है,

इस संबंध में LogicalNews ने किया पड़ताल तो आए कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने जानिए क्या है मामला।


फर्जी Website-

जिस वेबसाईट से ऐसा ऑफर दिया जा रहा है उसका address है http://reliance-4g-lyf.com/ जोकि इक फ़र्ज़ी वेबसाइट है जिसका रिलायंस से कोई लेने देना नहीं है जबकि ये लोगो को रिलाइंस के नाम पर फसा रहा है,
Reliance Jio का नेटवर्क टेस्ट- 

आपको बताते चले की रिलाइंस जिओ ने अभी अपने नेटवर्क की टेस्टिंग हेतु फ्री सिम देने शुरू किये है पर वो अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स और अन्य चैनल को ही है पब्लिक को टेस्टिंग के लिए सिम देने हेतु अपनी वेबसाइट https://www.jio.com/ पर आपका रजिस्ट्रेशन करवाती है , आप इस वेबसाइट पर जाकर अपना फॉर्म भरें फिर आपकी email id पर लिंक आएगी।

फर्जी Website कर रही Whatsapp का उपयोग-
उपरोक्त फर्जी वेबसाइट आप को रजिस्ट्रेशन के बाद उसकी प्रचार लिंक को whatsapp पर 8 लोगो को share करने को कहेगी जब आप लोभ में पड़कर 8 लोगो या ग्रुप में इसको शेयर करेंगे तो आपकी इक दूसरा लिंक देगी।

आप Download करेंगे Virus -

इस तरह 8 लोगों को शेयर करने के बाद आप को इक APK file जोकि इस फ़र्ज़ी साईट की पार्टनर वेबसाइट से आएगा जिसको की आपको इनस्टॉल करने को कहेगा, अगर आपने इस apk फ़ाइल या Android app को अपने मोबाइल में download और Install किया तो आपके फ़ोन में "a.spread.DroidDream.bi" नाम का इक वायरस इनस्टॉल हो जाएगा ।

क्या करता है ये वायरस-

ये वायरस a.spread.DroidDream.bi आपके फ़ोन की प्रिवेसी सेटिंग्स को चुराता है साथ ही बैकग्राउंड में इनको Delete कर देता है ताकि और वायरस आप के फोन में आ सके और आपके फ़ोन के बारे में जानकारी वायरस बनाने वालों और अन्य Online fraud करने वालो को मिल सके, इसके बाद अगर आप इस app को हटा देते है तब भी वायरस नहीं जाएगा और आप का पैसा साथ ही अन्य जानकारी जो फोन में है उसका इस्तेमाल कोई और कर सकता है , आपको ठगने के लिए ।

मत करे शेयर Whatsapp पर-

इस वेबसाइट के लिंक को आप व्हाट्सएप्प पर बिल्कुल भी शेयर न करे और अपने मित्रो को सुरक्षित रखे साथ ही खुद भी इस वायरस और ऑनलाइन चोरी से बचे , अगर आप के फोन में कोई पासवर्ड या बैंक की जानकारी है तो ये app बिना कोई सूचना दिए सारी जानकारी चोरी कर लेगा । 

ऐसी प्रलोभनो से बचे और सुरक्षित रहे और यदि आपको कोई ऐसी लिंक भेजें


- TheLogicalNews
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15.8.16

सपा में क्या चल रहा मुख्तार vs अखिलेश या सिर्फ ड्रामा ?


लख़नऊ
सपा में फिर घमासान की तैयारी देखिये कुछ मामले-

समाजवादी पार्टी या कहे की मुलायम सिंह के परिवार में बीच बीच में पारिवारिक ड्रामे होते रहते है और इनका कहीं न कही राजनीतिक निहितार्थ भी होते है अभी खुछ दिन पहले शिवपाल और अखिलेश के बीच विवाद हुआ था माफिया मुख्तार अंसारी को सपा का सदस्य बनाने को लेकर, फिर नेता जी मुलायम के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ,


शिवपाल के बयान
अभी फिर वैसा ही मामला फिर पैदा हो रहा जिसकी पृष्टभूमि कई दिन से चल रही है, कई दिनों से आप LogicalNews पर पढ़ रहे होंगे की शिवपाल अधिकारियो पर गुस्से में है और बोले थे की ऊँचे पदों पर बैठे अधिकारी लुटेरे हो गए है, साथ ही कार्यकर्ताओं को नसीहत दी थी की कार्यकर्ता जमीन पर कब्ज़ा करना बंद करे नहीं तो इस्तीफा दे दूंगा,

मुलायम सिंह का बयान

शिवपाल के इस्तीफे की बात पर नेता जी ने तुरंत समझ गए की शिवपाल भैया गुस्से में है और अखिलेश को झड़प दिया बोले शिवपाल गए तो ऐसी तैसी हो जाएगी, अखिलेश के मंत्री बोझ है, मेरी बनाई पार्टी को खत्म कर रहे, उनका पूरा फोकस अखिलेश पर ही था,

नया मामला - 

आज सपा के कुछ विश्वस्त न्यूज़ चैनलों से खबर है की माफिया मुख्तार अंसारी को सपा की सदस्यता दिलाई जाएगी, कही ये सारी कवायद इसीलिए तो नहीं थी ताकि शिवपाल अपने प्रिय मित्र मुख्तार अंसारी को सायकिल को सवारी करवा सके,

क्या है कारण-
 इन सभी विवादों का कारण आगामी 2017 का विधानसभा चुनाव है जिसमें जीतना या सम्मानजनक स्थिति में रहना सपा के लिए आवश्यक है और पार्टी का मुख्य वोट यादव और मुसलमान  इस समय बाटे हुए है मुसलमान अति यादव वाद के कारन सपा से नाराज़ है और ये बात नेता जी को पता है

अखिलेश के नेतृत्व पर पूर्ण भरोसा नहीं-

चुनाव आगे 4 महीने बाद है और UP में कांग्रेस, बसपा सहित ओवैसी भी मुसलमान वोट का दावा करेंगे जोकि सपा को कमजोर करेगा मुलायम का मानना है की ऐसे में सिर्फ युवा चेहरे के भरोसे चुनाव् में जाना ठीक नहीं इस लिए मुख्तार जोकि पूर्वांचल में मुस्लिम वोट दिला सकते है को पार्टी में लेना चाहिए इसके साथ ही और भी कई क्षत्रपों को सपा अपने साथ लाएगी

अखिलेश की छवि-
अखिलेश इक पढ़े लिखे  बेदाग छवि के युवा नेता है पर वह अपनी छवि इक कठोर प्रसासक की नहीं बना पाए और अभी तक भैया की इमेज से निकल नहीं सके है पर  वह इन अपराधियों को कैसे स्वीकार करेंगे देखने वाली बात होगी की क्या  ये सच में विवाद है ये अखिलेश को और ताकत देने का मुलायम का पैतरा जल्द होगी तस्वीर साफ़।

-TheLogicalNews

8.8.16

GST के विषय जानिए सबकुछ, क्यो आवश्यक है भारत के लिये


राज्यसभा ने GST संविधान संशोधन विधेयक को 203 वोटों से पारित कर कर सुधारों का रास्ता साफ़ कर दिया है, अब कुछ और विधाई औपचारिकताओं के बाद GST इक सच्चाई होगा, ये मोदी सरकार और भारत की जनता की बड़ी जीत है।

अटल विहारी वाजपेयी के समय से लटका है GST-

गुड्स ऐंड सविर्सेज टैक्स व्यवस्था यानी जीएसटी को आजादी के बाद से टैक्स क्षेत्र का सबसे बड़ा रिफॉर्म माना जा रहा है। 2003 में अटल सरकार इसे लाने का प्रयास करती रही पर पास न हो सका, 2004 में  उनकी सरकार गिरने के बाद, इसके लिए कांग्रेस ने खास प्रयास नहीं किये फिर 2007-08 में P चिदंबरम ने इसे बजट में शामिल किया,उन्होंने इसे लागू करने के लिए अप्रैल 2010 का समय तय किया था। लेकिन कारोबारी समुदाय के विरोध और राज्यों की असहमति के कारण टलता हुआ यह अब भी हकीकत की जमीन पर उतरने की बाट जोह रहा है। उम्मीद है कि राज्यसभा से संशोधन विधेयक पारित होने के बाद इस जीएसटी लागू करने की दिशा में काम आसान हो जाएगा।

क्या है GST
जीएसटी एक ऐसा टैक्स है, जो राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी सामान या सेवा की मैन्युफैक्चरिंग, बिक्री और इस्तेमाल पर लगाया जाता है। इस सिस्टम के लागू होने के बाद चुंगी, सेंट्रल सेल्स टैक्स (CST), राज्य स्तर के सेल्स टैक्स या वैट, एंट्री टैक्स, लॉटरी टैक्स, स्टैंप ड्यूटी, टेलिकॉम लाइसेंस फी, टर्नओवर टैक्स, बिजली के इस्तेमाल या बिक्री पर लगने वाले टैक्स, सामान के ट्रांसपोटेर्शन पर लगने वाले टैक्स इत्यादि खत्म हो जाएंगे।

कैसे करेगा काम-
इस व्यवस्था में गुड्स और सविर्सेज की खरीद पर अदा किए गए जीएसटी को उनकी सप्लाई के वक्त दिए जाने वाले जीएसटी के मुकाबले अजस्ट कर दिया जाता है। हालांकि यह टैक्स आखिर में कन्जयूमर को देना होता है क्योंकि वह सप्लाई चेन में खड़ा आखिरी शख्स होता है। मिसाल के तौर पर, अगर दिल्ली का कोई मैन्युफैक्चरर 1 करोड़ रुपये का सामान दिल्ली के ही किसी डिस्ट्रीब्यूटर को बेचता है तो 18 फीसदी जीएसटी (काल्पनिक) के लिहाज से उसे 18 लाख रुपये सरकार को अदा करने होंगे। लेकिन अगर उस मैन्युफैक्चरर को 1 करोड़ के सामान का इनपुट कॉस्ट 60 लाख रुपये पड़ा हो तो उसने पहले ही टैक्स के तौर पर 10.8 लाख रुपये चुका दिए हैं।

ऐसे में डिस्ट्रीब्यूटर को बिक्री के बाद उसे केवल 7.20 लाख (18-10.80) रुपये ही अदा करने होंगे। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि जीएसटी में सेवाएं भी शामिल हैं, तो उसने मैन्युफैक्चरिंग में जो बिजली खर्च की है और उस पर सर्विस टैक्स के रूप में जीएसटी का जो भुगतान किया है, वेयरहाउस के इस्तेमाल का सविर्स टैक्स दिया है और जो दूसरी सविर्सेज के लिए टैक्स दिए हैं, वे सब भी इनपुट टैक्स क्रेडिट के तौर पर उसकी अंतिम देनदारी में से घटेंगे। यह प्रक्रिया फिर डिस्ट्रीब्यूटर से डीलर, डीलर से रीटेलर और रीटेलर से कन्जयूमर तक दोहराई जाएगी।

GST के फायदे
GST मौजूदा टैक्स ढांचे की तरह कई जगहों पर न लग कर सिर्फ डेस्टिनेशन पॉइंट पर लगेगा। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक किसी सामान पर फैक्ट्री से निकलते समय टैक्स लगता है और फिर रीटेल पॉइंट पर भी जब वह बिकता है, तो वहां भी उस पर टैक्स जोड़ा जाता है। जानकारों का मानना है कि टैक्सेशन के नए सिस्टम से जहां भ्रष्टाचार में कमी आएगी, वहीं लालफीताशाही भी कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।

सरकार को फायदे: जीएसटी के तहत टैक्स स्ट्रक्चर आसान होगा और टैक्स बेस बढ़ेगा। इसके दायरे से बहुत कम सामान और सेवाएं बच पाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद एक्सपोर्ट, रोजगार और आर्थिक विकास में जो बढ़ोतरी होगी, उससे देश को सालाना अरबों रुपये की आमदनी होगी।

आप को  फायदे: GST सिस्टम में केंद्र और राज्यों, दोनों के टैक्स सिर्फ बिक्री के समय वसूले जाएंगे। साथ ही ये दोनों ही टैक्स मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट के आधार पर तय होंगे। इससे सामान और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम कन्जयूमर को फायदा होगा।

कंपनियों को फायदे: गुड्स और सविर्सेज के दाम कम होने से उनकी खपत बढ़ेगी। इससे कंपनियों का प्रॉफिट बढ़ेगा। इसके अलावा कंपनियों पर टैक्स का औसत बोझ कम होगा। टैक्स सिर्फ बिक्री के पॉइंट पर लगने से प्रॉडक्शन कॉस्ट कम होगी। इससे एक्सपोर्ट मार्केट में कंपनियों की प्रतिस्पर्द्धी क्षमता बढ़ेगी।

नैशनल काउंसिल ऑफ अप्लायड इकनॉमिक रिसर्च के मुकाबिक जीएसटी लागू होने से...
1. इकनॉमिक ग्रोथ में 0.9 से लेकर 1.7 फीसदी की बढ़ोतरी होगी।
2. एक्सपोर्ट में 3.2 से 6.3 फीसदी तक की बढ़ोतरी होगी।
3. इंपोर्ट में 2.4 से 4.7 फीसदी तक की बढ़ोतरी होगी।

जीएसटी का मॉडल
1. भारत में प्रस्तावित जीएसटी सिस्टम ड्युअल होगा। इसमें किसी भी सामान की टैक्सेबल वैल्यू पर सेंट्रल गुड्स ऐंड सविर्सेज टैक्स (सीजीएसटी) और स्टेट गुड्स ऐंड सविर्सेज टैक्स (एसजीएसटी) लागू होंगे। साथ ही इसमें सेवाएं और सामान में टैक्स स्लैब के लिहाज से कोई फर्क नहीं किया जाएगा।

2. सेंट्रल जीएसटी में दिए गए टैक्स को सिर्फ सेंट्रल जीएसटी के लिए ही इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) किया जा सकेगा। उसी तरह स्टेट जीएसटी में दिए गए टैक्स को सिर्फ स्टेट जीएसटी के लिए ही इनपुट टैक्स क्रेडिट किया जा सकेगा। सीजीएसटी और एसजीएसटी के बीच आईटीसी को अदल-बदल कर इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। (आईटीसी उस व्यवस्था को कहते हैं, जिसमें किसी प्रॉडक्ट की खरीद के समय दिए गए टैक्स को उसे बेचते समय दिए गए टैक्स में से घटा दिया जाता है, ताकि टैक्स भुगतान के दोहराव को खत्म किया जा सके।)

3. हर टैक्सपेयर को पैन लिंक्ड टैक्सपेयर आइडेंटिफिकेशन नंबर जारी किया जाएगा, जिसमें 13 या 15 अंक होंगे। उसके जरिए टैक्सपेयर को सेंट्रल और स्टेट जीएसटी अधिकारियों के पास तय अवधि में रिटर्न दाखिल करते रहना होगा। आईडी नंबर और पैन के आपस में जुड़े होने से टैक्स चोरी को रोकने में मदद मिलेगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।

4. हर ट्रांजैक्शन में सेंट्रल जीएसटी और स्टेट जीएसटी के हिस्से होंगे और वे एक ही कीमत पर लगेंगे। एसजीएसटी सिर्फ तभी लगेगा जब सप्लायर और जिसे सप्लाई किया जाए, दोनों एक ही राज्य में स्थित होंगे।

जीएसटी की न्यूनतम सीमा
हालांकि, इस पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है, लेकिन ऐसा अनुमान है कि जीएसटी के दायरे में आने के लिए ग्रॉस सालाना टर्नओवर कम-से-कम 10 लाख रुपये होगा। यह टर्नओवर गुड्स और सविर्सेज को मिलाकर होगा और पूरे देश में लागू होगा। अगर कोई ट्रांजैक्शन एक राज्य के भीतर ही हो, तो उस पर सिर्फ एसजीएसटी लगेगा। हालांकि, इस पर केंद्र और राज्य सरकारों पर कई बार बातचीत हो चुकी है। सरकार राज्यसभा में इसे क्लियर कर सकती है।

टैक्स दरों पर असर
हालांकि अभी इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन अनुमान है कि पहले साल में जीएसटी दरें अधिकतम 18 फीसदी के लगभग होंगी। बाद में धीरे-धीरे इसमें कटौती की जाएगी। फिलहाल सविर्सेज पर 14 फीसदी की दर से टैक्स लगता है, जबकि ज्यादातर गुड्स पर कुल इनडायरेक्ट टैक्स 20 फीसदी लगता है यानी टैक्स दरें कुल मिलाकर कम ही होंगी। जीएसटी के रेट तय होने के बाद ही केंद्र और राज्य सीजीएसटी और एसजीएसटी की दरों का फैसला करेंगे।

जीएसटी के दायरे से बाहर
अल्कोहल, तंबाकू प्रॉडक्ट्स और पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स पर जीएसटी की दरें लागू नहीं होंगी। इसके अलावा एक्सपोर्ट को भी जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है। एक्सपोर्ट के लिए खरीदे गए गुड्स और सविर्सेज पर जो जीएसटी वसूला जाएगा, वह में बाद रिफंड कर दिया जाएगा। इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स और कैपिटल गेन टैक्स जैसे डायरेक्ट टैक्सेज पर भी इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

राज्यों पर असर
चूंकि, जीएसटी उपभोग आधारित टैक्स है, इसलिए जिस राज्य में गुड्स और सविर्सेज की खपत जितनी अधिक होगी, उसका टैक्स रेवेन्यू उतना ही ज्यादा होगा। ऐसे में जो राज्य पिछड़े हैं, जीएसटी लागू होने के बाद उनका रेवेन्यू घटेगा। केंद्र सरकार ने कहा है कि किसी राज्य को जीएसटी लागू होने के बाद जो घाटा होगा, उसे वह पूरा करेगी।

वैधानिक स्थिति
1. संविधान संशोधन विधेयक को राज्यसभा में मौजूद तथा वोट देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई हिस्से का समर्थन मिलना जरूरी। इसके साथ ही इस टैक्स सिस्टम के हकीकत बनने के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं को इसे सहमति देना भी जरूरी होगा।

2. इसी तरह, राज्यों को मॉडल बिल की तर्ज पर अपने अलग जीएसटी बिल तैयार करने होंगे और उन्हें अपनी विधानसभाओं में पारित कराना होगा।

3. लागू होने के बाद जीएसटी कई स्थानीय टैक्स के अलावा सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, सविर्स टैक्स और वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) की जगह लेगा।

जीएसटी ट्रिविया
1. दुनिया के 140 देशों में लागू है जीएसटी।
2. 1954 में जीएसटी लागू कर फ्रांस ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना।
3. ज्यादातर देशों में केंद्र और राज्यों का एक जीएसटी (एकल) सिस्टम लागू है।
4. भारत की तरह का ड्युअल जीएसटी सिस्टम ब्राजील और कनाडा में भी है GST मॉडल

-TheLogicalNews
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