30.8.16

उत्तर प्रदेश की राजनीति और ब्राम्हणों की स्थिति


आदिकाल से सम्मान और ज्ञान के भूखे रहे ब्राम्हणों की पौराणिक महत्ता को दिखता इक छन्द-

ब्राम्हण सोखि समुद्र लिह्यो अरु,
ब्राम्हण साठि हजार को जारे।।
ब्राम्हण लात हनी हरि के उर
ब्राम्हण ही यदुबंश उजारे।।
ब्राम्हण पैठि पाताल छलौ बलि,
ब्राम्हण क्षत्रिन् के दल मारे।।
ब्राम्हण से जनि बैर करैयो कोई,
ब्राम्हण से परमेश्वर हारे।।


ब्राम्हण राजनीति-
उत्तर प्रदेश के 2017 में होने वाले चुनावों की गोटिया बिछने लगी है , बीजेपी ने पिछड़ो और दलितों को अपने पाले में करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है , लक्ष्मीकांत वाजपेयी को हटाकर केशव मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाना इस दिशा में पहली कड़ी थी केंद्र में हुए विस्तार में भी कृष्णा राज, रामदास आठवले व् अनुप्रिया पटेल को मंत्री बनाया जाना भी रणनीतिक एजेंडा के अंतर्गत ही हुआ, नरेंद्र मोदी, अमित शाह व संघ के भी बड़े नेता पिछड़ी जातियो से आते है इस लिए BJP को यूपी के जातीय दंगल में लगभग 48% वोट रखने वाले पिछड़ो पर भरोसा दिख रहा है,

यूपी का जातीय गणित- 
UP में स्पष्ठ रूप से पिछड़ी जातियो का बहुमत है NSSO के आकड़ो के अनुसार यूपी में 
ब्राम्हण- 13%
क्षत्री- 9%
वैश्य- 3%
यादव-10%
दलित-
(चमार/ जाटव के बिना)17%
जाटव/चमार- 4%
मुस्लिम 
(व अन्य अल्पसंख्यक)- 18% 
अन्य OBC - 26%
( कुर्मी-5% आदि)

( ये आंकड़े अलग जगह और अलग सर्वे में कुछ और भी हो सकते है)

ब्राम्हणों की स्थिति- 
अपनी बौद्धिक क्षमता और सभी विषयों में पारंगत माने जाने वाले ब्राम्हण राजनैतिक व सामाजिक रूप से सदैव प्रभावशाली रहे है स्वयं राजा न होकर भी राजसत्ता व समाज को संवृद्धि की दिशा देने हेतु ब्राम्हण सदैव योगदान देता रहा है,
विश्व की 10 सबसे प्रभावशाली कंम्यूनिटी हेतु TIME Magazine द्वार 2010 में किये गए सर्वे में ब्राम्हण 7वें पायदान पे था जबकी भारत की अन्य कोई समूह इसमें शमिल नहीं हो पाया, 
एशिया में 2nd (हान चाइनीज़ के बाद) और भारत में ब्राम्हण सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक, आर्थिक व राजनितिक समूह माना गया है,

कांग्रेस काल और राजनीति-

पूर्व में कांग्रेस की रणनीति सदैव ब्राम्हण+ दलित+ मुसलमान के गठजोड़ की रही है और इसी से कांग्रेस ने अब तक देश पर राज किया देखिये- (13+21+18= 52%) जो की सामान्य बहुमत से ज्यादा है क्षत्रिय भी कमोवेश ब्राम्हण के साथ ही रहे है या अलग भी रहे तो ब्राम्हणों के साथ इनके वोट आते रहे है परंतु राममंदिर व कांशीराम द्वारा 1990 के दसक में चले आंदोलनो के बाद ब्राम्हण बनियो या OBC की पार्टी मानी जाने वाली BJP की ओर झुक गया, मुस्लिम यादव नेता मुलायम के साथ और दलित जाटवों (चमारों) की पार्टी BSP को वोट देने लगा और तीनो ही सत्ता को अपने हाथो से गवां बैठे,

ब्राम्हणों का BJP से जुड़ाव-

राममंदिर आंदोलन के समय की परिस्थितियों में राजनीति ने जाति की बजाय धर्म आधारित पहचान का रुख किया और बीजेपी ने इसका फायदा लिया साथ ही तत्कालीन नेता अटल बिहारी बाजपेयी ब्राम्हणों के Icon थे जिनके नाम पर और हिन्दू सम्मान के लिए ब्राम्हण बीजेपी से जुड़ गया ।

बाद में बदली परिस्थितियां-

2004 में अटल जी के दिल्ली की सत्ता से हटने के बाद व यूपी में कांग्रेस के समाप्त होने के कारन ब्राम्हण खुद को सत्ता से दूर पाने लगा,
तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जोकि ब्राम्हणों से सहज चिढ़ रखते है के समय में हुए अत्याचारों से तंग आकर मुलायम को हटाने के लिए ब्राम्हण बसपा की नेता मायावती के साथ आया और 2007 में पूर्ण बहुमत से बसपा सत्ता में आई,

बसपा का कटु अनुभव-
2007 में मायावती को प्रदेश की सत्ता सौपने के बाद भी ब्राम्हण उपेक्षित ही रहा और बसपा नेता सतीश मिश्र उनके परिवार व् कुछ साथी वकीलों के आलावा बाकी ब्राम्हण अत्याचार ही सहते रहे साथ ही मायावती के भरस्टाचार से परेशान हो चुके समाज ने मायावती के विरोध का मन बनाया,

2012 में अखिलेश की सरकार और ब्राम्हण का योगदान-

मायावती के बसपा से मोहभंग होने और BJP व् कांग्रेस के शक्तिहीन होने की स्थिति में 2012 के चुनाव में ब्राम्हणों ने मुलायम व उनके बेटे अखिलेश का खुलकर विरोध नहीं किया जिस कारण वोट बटा कुछ वोट सपा ने भी पाया और अखिलेश सत्ता पाने में कामयाब हुए,

वर्तमान की स्थिति- 
अखिलेश की सरकार लगभग अपना कार्यकाल पूरा कर चुकी है और इस समय में पूरा सत्ता सुख यादवों ने ही भोगा है ऐसा लोगो का मानना है, सभी वर्गों की तरह ब्राम्हण भी सपा से नाराज है 2014 में मोदी को सत्ता में लाने वाला पंडित ही था ये मोदी अमित शाह सहित संघ को भी पता है पर मोदी की केंद्र सरकार में भी ब्राम्हण खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है और किसी अन्य विकल्प की तलाश में है,

स्वाती सिंह प्रकरण- ब्राम्हण और क्षत्रिय अलग दिखने के बाद वैसे ही आपस में जुड़े है जैसे माला और धागा , इस मामले में दयाशंकर की बेटी और पत्नी के मायावती का विरोध करने के बाद क्षत्रिय आंदोलित हुआ साथ ही ब्राम्हणों द्वारा मायावती का साथ देने का विकल्प भी लगभग समापत है ।

शीला दीक्षित के बाद आगे की रणनीति-
बीजेपी सहित अब सपा और कांग्रेस भी ब्राम्हणों के लिए विकल्प है क्योंकि शीला दीक्षित के नाम पर कांग्रेस को वोट दिया जा सकता है क्योंकि जब सभी पार्टियाँ OBC/SCST के पीछे भाग रही है तब कांग्रेस अपने पुराने वोटर के साथ खड़ी हुई दिख रही,

ऐसे में दूसरा विकल्प यदि बीजेपी धार्मिक मुद्दे को आगे करती है और साम्प्रदायिक गोलबंदी हो तो धर्म की रक्षा के कारण ब्राम्हण BJP को वोट देने के विकल्प पर विचार करेगा परन्तु राजनीति में सबकुछ आइस्थिर रहता है, आगे की रणनीति देखने वाली होगी, क्योंकि अभी तक BJP किसी प्रत्यासी का नाम घोषित नहीं कर पाई है ।

-TheLogicalNews

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