लख़नऊ
उत्तर प्रदेश के सभी 80 सीटों के नतीजे घोषित हुए, घोषित नतीजो के अनुसार दलीय स्थिति इस प्रकार
BJP-62
BSP-10
SP -5
अपना दल- 2
कांग्रेस- 1
BSP-10
SP -5
अपना दल- 2
कांग्रेस- 1
गौरतलब है कि इस चुनाव की कई तरीके से समीक्षा की जाएगी पर एक बाद जो साफ दिख रही है वो ये है कि साल 2019 में कांग्रेस से भी बडे लूज़र अखिलेश यादव बने, जिन्होंने अपना वोट ट्रांसफर करवा कर मायावती को 10 सीटें दिलवाई जबकि सपा को 5 पर ही बनाए रखा।
अपने पिता की तरह जनता से जुड़े नहीं
शुरू से ही अखिलेश यादव धरातल से जुड़े हुए नेता नही रहे है साल 2012 में इनके पिता व सपा संस्थापक नेता जी मुलायम सिंह ने UP विधानसभा चुनाव मायावती को हराकर जीता व इनको मुख्यमंत्री बनाया, उसी समय से अखिलेश के नेतृत्व में हुए हर चुनाव को सपा हारती चली गई चाहे 2014 हो 2017 या 2019 अपने गलत निर्णयों व गठबंधनों से सपा के संगठन को खत्म करते जा रहे है अखिलेश यादव, अखिलेश सदैव ही चापलूसों से घिरे रहने वाले अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति की छवि बना रहे है, अखिलेश जी ने गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव के बाद राष्ट्रीय राजनीति में छाने के सपने देखने शुरू किए पर सच्चाई से दूर होते गए, इस गठबंधन को लेकर भी नेताजी ने पहले ही सचेत किया था जिसका परिणाम सामने है।
बार बार चूक रहे अखिलेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मामला गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों के बिल्कुल उलट गया है, जहां SP ने BSP की मदद से प्रभावशाली जीत हासिल की थी। इस बार यादव बिरादरी ने वोट BSP को ट्रांसफर किया, लेकिन दलित समुदाय ने SP को वोट देने के बजाय BJP को वोट दे दिया। इसके अलावा कांग्रेस ने सिर्फ रायबरेली सीट जीती, लेकिन उसने बाराबंकी, बदायूं, संत कबीर नगर और बस्ती जैसी करीब आधा दर्जन लोकसभा क्षेत्रों में गठबंधन का खेल बिगाड़ दिया जबकि इन चीजों को समझने में नाकामयाब रहे अखिलेश जी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मामला गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों के बिल्कुल उलट गया है, जहां SP ने BSP की मदद से प्रभावशाली जीत हासिल की थी। इस बार यादव बिरादरी ने वोट BSP को ट्रांसफर किया, लेकिन दलित समुदाय ने SP को वोट देने के बजाय BJP को वोट दे दिया। इसके अलावा कांग्रेस ने सिर्फ रायबरेली सीट जीती, लेकिन उसने बाराबंकी, बदायूं, संत कबीर नगर और बस्ती जैसी करीब आधा दर्जन लोकसभा क्षेत्रों में गठबंधन का खेल बिगाड़ दिया जबकि इन चीजों को समझने में नाकामयाब रहे अखिलेश जी
मौजूदा चुनाव में गंभीर नेता के तौर पर नही दिखे अखिलेश
प्रचार के दौरान अखिलेश CM योगी की मिमिक्री करने वाले एक व्यक्ति को साथ लेकर मनोरंजन करते हुए दिखते थे मायावती और अखिलेश ने अपने भाषणों में प्रधानमंत्री पर जमकर निशाना साधा था और हमेशा नया प्रधानमंत्री लाने की बात करते थे। वे जाति या अपने उम्मीदवारों के बारे में काफी कम बात करते थे, जो उनकी सबसे मजबूत ताकत थी। उनके भाषणों में किसी विकल्प देने की बजाय राष्ट्रीय राजनीति पर छाने की अभिलाषा ज्यादा झलकती थी जिसे जनता ने हल्के में लिया
प्रचार के दौरान अखिलेश CM योगी की मिमिक्री करने वाले एक व्यक्ति को साथ लेकर मनोरंजन करते हुए दिखते थे मायावती और अखिलेश ने अपने भाषणों में प्रधानमंत्री पर जमकर निशाना साधा था और हमेशा नया प्रधानमंत्री लाने की बात करते थे। वे जाति या अपने उम्मीदवारों के बारे में काफी कम बात करते थे, जो उनकी सबसे मजबूत ताकत थी। उनके भाषणों में किसी विकल्प देने की बजाय राष्ट्रीय राजनीति पर छाने की अभिलाषा ज्यादा झलकती थी जिसे जनता ने हल्के में लिया
सवर्णों का धुर विरोधी दिखने का प्रयास पड़ा भारी
सपा ने 2019 में जितने टिकट दिए एक भी सवर्ण समाज से नही था व अपने घोषणापत्र में सवर्णो पर TAX लगाने की भी बात की थी साथ ही अपनी रैलियों में सवर्णो की कोसते रहते थे जबकि मायावती व BJP ने सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाई जिसका उनको व BJP को फायदा मिला और अखिलेश की सपा पिछड़ती गई।
इन हालात में 2022 भी अखिलेश के लिए मुश्किल
2019 के चुनाव में सपा की गढ़ रही कन्नौज सीट से अपनी पत्नी व बदायूं से अपने चचेरे भाई की हार व UP में फिर से सर उठाती BSP अखिलेश के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में परेशानी का सबब बनेगी जबकि अखिलेश मान के बैठे है कि अगला CM मैं हूं ऐसे में UP के सफलतम राजनेता के पुत्र होने के अतिरिक्त अखिलेश पर जिम्मेदारी है कि वो अपने आप को एक गंभीर व समझदार नेता की तरह सिद्ध करें ना कि EVM, साम्प्रदायिकता आदि बहानों से सच्चाई को ढकने का प्रयास करें।
2019 के चुनाव में सपा की गढ़ रही कन्नौज सीट से अपनी पत्नी व बदायूं से अपने चचेरे भाई की हार व UP में फिर से सर उठाती BSP अखिलेश के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में परेशानी का सबब बनेगी जबकि अखिलेश मान के बैठे है कि अगला CM मैं हूं ऐसे में UP के सफलतम राजनेता के पुत्र होने के अतिरिक्त अखिलेश पर जिम्मेदारी है कि वो अपने आप को एक गंभीर व समझदार नेता की तरह सिद्ध करें ना कि EVM, साम्प्रदायिकता आदि बहानों से सच्चाई को ढकने का प्रयास करें।
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