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ऊर्जा संकट और बदलती दुनिया: कैसे geopolitics अब अर्थव्यवस्था को चला रही है
दुनिया की अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां फैसले सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक घटनाएं तय कर रही हैं। हाल के वैश्विक विश्लेषणों, विशेषकर The Economist की रिपोर्ट्स में यह संकेत मिलता है कि ऊर्जा आपूर्ति, युद्ध और रणनीतिक तनाव अब economic stability के सबसे बड़े drivers बन चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, दुनिया के लगभग 20% crude oil और करीब 25–30% LNG का प्रवाह Strait of Hormuz जैसे संकरे समुद्री मार्ग से होता है। जैसे ही इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें तुरंत $80–100 प्रति बैरल के दायरे में पहुंच जाती हैं, और कई बार “risk premium” जुड़ने से यह $110 तक भी जा सकती हैं। इसका असर सिर्फ fuel तक सीमित नहीं रहता, बल्कि transport cost, aviation fuel और fertilizers तक फैलता है, जिससे पूरी global economy पर inflationary दबाव बनता है।
इस स्थिति का सीधा असर वैश्विक growth पर दिख रहा है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार global growth लगभग 2.8–3.0% के बीच सीमित रहने की संभावना है, जो पिछले दशक के औसत (~3.5%) से कम है। इसके साथ ही global debt एक बड़ा structural risk बन चुका है—दुनिया पर कुल कर्ज लगभग $340 trillion तक पहुंच गया है, जबकि global GDP करीब $100–105 trillion है, यानी debt-to-GDP ratio 300% से अधिक है। जब interest rates 4–5% के आसपास बने रहते हैं, तो कई देशों के लिए debt servicing (interest + repayment) उनके बजट का 20–30% हिस्सा लेने लगता है। यही वजह है कि कई emerging economies में default risk बढ़ रहा है और IMF बार-बार debt sustainability को लेकर चेतावनी दे चुका है।
भारत इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में एक मिश्रित स्थिति में खड़ा है। एक ओर इसकी growth rate लगभग 6–6.5% बनी हुई है, जो इसे दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में रखती है। लेकिन दूसरी ओर, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85–88% crude oil आयात करता है। अगर तेल की कीमत में $10 प्रति बैरल की वृद्धि होती है, तो भारत के import bill में लगभग $12–15 billion का अतिरिक्त दबाव आ सकता है। इसका असर सीधे inflation (विशेषकर fuel और food inflation), current account deficit और fiscal balance पर पड़ता है। साथ ही, diesel और fertilizer लागत बढ़ने से agriculture sector भी प्रभावित होता है, जिससे food prices में बढ़ोतरी की संभावना रहती है।
यह पूरा बदलाव एक गहरी संरचनात्मक सच्चाई की ओर इशारा करता है—अब अर्थव्यवस्था सिर्फ demand और supply के नियमों से संचालित नहीं होगी। आने वाले समय में वही देश स्थिर और मजबूत रहेंगे, जिनके पास diversified energy sources, strategic reserves (जैसे India के लगभग 5.3 million tonnes strategic petroleum reserves) और resilient supply chains होंगी। वैश्विक व्यवस्था अब efficiency की नहीं, बल्कि resilience की परीक्षा ले रही है। और यही नया आर्थिक युग परिभाषित करेगा—जहां growth का आधार सस्ती उत्पादन लागत नहीं, बल्कि सुरक्षित और स्थिर आपूर्ति तंत्र होगा।
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