अंकारा की सड़को पर घूमते टैंक।
तुर्की में सेना की इक धड़े ने की तख्ता पलट की कोशिश, स्थानीय लोगो का मिला समर्थन ,अबतक 70 लोग मरे 150 से अधिक हिरासत में पुलिस के सभी बड़े अधिकारी मारे गए है, राष्ट्रपति इंडोगेन ने तख्ता पलट पर काबू प् लेने की घोषणा की है परंतु सबसे बड़ा प्रश्न अब उठ खड़ा हुआ की आखिर क्यों सेना ने ये प्रयास किया और सेना को स्थानीय लोगो का समर्थन हासिल क्यों हुआ
तुर्की में सेना ने तख्तापलट की नाकाम कोशिश की. पुलिस व सेना के अन्य बटालियन ने रिसेप तईप एर्दोगन की सरकार को गिरने से बचा लिया. लेकिन तुर्की में ये स्थिति अचानक नहीं बनी. सन 1960 से लेकर अब तक तुर्की में 3 बार तख्तापलट किया जा चुका है. आइए जानते है इसके प्रमुख कारण।
1. शक्तियो का केन्द्रीयकरण
रिसेप तईप एर्दोगन की 'एके पार्टी' (एब्रिविएशन ऑफ टर्किश इनिशियल्स ऑफ जस्टिस एंड डेवलेपमेंट पार्टी) 2002 में सत्ता में आई थी. इससे एक साल पहले ही एके पार्टी बनाई गई थी. तभी से रिसेप एर्दोगन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे राष्ट्रपति के इर्द-गिर्द सारी शक्तियां केंद्रित करना चाहते हैं. उन्होंने कथित तौर पर लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ काम किया.
2. तुर्की सरकार का इस्लाम के प्रति झुकाव-
एरडोगन के सत्ता में आने के बाद से ही सरकार का रुख इस्लाम की तरफ झुक रहा है. देश में धर्मनिरपेक्ष कानूनों की जगह इस्लामिक नियमों को लागू करने के लिए कई कानून भी पास किए गए.
3. अमेरिका से खराब संबंध
तुर्की और अमेरिकी सेना के करीबी रिश्ते हैं, लेकिन फिर भी पश्चिमी नेताओं के साथ तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के रिश्ते खराब हैं. एर्दोगन और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच भी कई बार तनाव की स्थिति पैदा हो चुकी है, ISIS के मुद्दे पर भी तुर्की के राष्ट्रपति का कोई साफ़ मत नहीं है और कमाल अतातुर्क के इतर अपनी सोच रखते है एरडोगन।
4. तुर्की सेना और एर्दोगन के तनाव भरे रिश्ते
साल 2002 में सत्ता में आते ही राष्ट्रपति एर्दोगन ने कई सैन्य अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई की और कई पर अदालतों में केस भी चला. इसके बाद से ही सेना और एर्दोगन के रिश्ते तल्ख हैं.कई बड़े अधिकारी जेल में है और सेना में सरकार का विरोध बढ़ रहा है।
5. संविधान में बदलाव का दबाव
एर्दोगन सत्ता में आने के बाद से ही संविधान के दोबारा निर्माण के पक्षधर हैं. एर्दोगन संविधान में बदलाव कर राष्ट्रपति पद को अमेरिकी रंग में ढालना चाहते थे. लेकिन उनकी इस चाहत ने उनके कई समर्थकों को उनसे दूर कर दिया.
6. अन्य देशों की प्रतिक्रिया
तुर्की विश्व के इस्लामिक देशो में सबसे शांत और धर्मनिरपेक्ष माना जाता है इसके संबंध भी सभी अन्य बड़े देशो से अच्छे है ऐसे में एरडोगन के ख़राब नीतियों के कारन ही सही पर तुर्की पर संकट देख सभी बड़ी शक्तियो ने तुर्की की सरकार का समर्थन किया जिसने सैनिक भावनाओं को और कमजोर करने में मदद की
7. जन भावनाएँ-तुर्की के लोग इस्लामी विचारधारा से अधिक प्रभावित नहीं है इसी कारण आधुनिक परुवेश में भी ISIS तुर्की में घुसने में नाकाम रहा है साथ ही विकास की द्रष्टि से भी संपन्न है पर एरडोगन की पार्टी का झुकाव लोगो को पसंद नहीं आ रहा
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रिसेप तईप एर्दोगन की 'एके पार्टी' (एब्रिविएशन ऑफ टर्किश इनिशियल्स ऑफ जस्टिस एंड डेवलेपमेंट पार्टी) 2002 में सत्ता में आई थी. इससे एक साल पहले ही एके पार्टी बनाई गई थी. तभी से रिसेप एर्दोगन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे राष्ट्रपति के इर्द-गिर्द सारी शक्तियां केंद्रित करना चाहते हैं. उन्होंने कथित तौर पर लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ काम किया.
2. तुर्की सरकार का इस्लाम के प्रति झुकाव-
एरडोगन के सत्ता में आने के बाद से ही सरकार का रुख इस्लाम की तरफ झुक रहा है. देश में धर्मनिरपेक्ष कानूनों की जगह इस्लामिक नियमों को लागू करने के लिए कई कानून भी पास किए गए.
3. अमेरिका से खराब संबंध
तुर्की और अमेरिकी सेना के करीबी रिश्ते हैं, लेकिन फिर भी पश्चिमी नेताओं के साथ तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन के रिश्ते खराब हैं. एर्दोगन और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच भी कई बार तनाव की स्थिति पैदा हो चुकी है, ISIS के मुद्दे पर भी तुर्की के राष्ट्रपति का कोई साफ़ मत नहीं है और कमाल अतातुर्क के इतर अपनी सोच रखते है एरडोगन।
4. तुर्की सेना और एर्दोगन के तनाव भरे रिश्ते
साल 2002 में सत्ता में आते ही राष्ट्रपति एर्दोगन ने कई सैन्य अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई की और कई पर अदालतों में केस भी चला. इसके बाद से ही सेना और एर्दोगन के रिश्ते तल्ख हैं.कई बड़े अधिकारी जेल में है और सेना में सरकार का विरोध बढ़ रहा है।
5. संविधान में बदलाव का दबाव
एर्दोगन सत्ता में आने के बाद से ही संविधान के दोबारा निर्माण के पक्षधर हैं. एर्दोगन संविधान में बदलाव कर राष्ट्रपति पद को अमेरिकी रंग में ढालना चाहते थे. लेकिन उनकी इस चाहत ने उनके कई समर्थकों को उनसे दूर कर दिया.
6. अन्य देशों की प्रतिक्रिया
तुर्की विश्व के इस्लामिक देशो में सबसे शांत और धर्मनिरपेक्ष माना जाता है इसके संबंध भी सभी अन्य बड़े देशो से अच्छे है ऐसे में एरडोगन के ख़राब नीतियों के कारन ही सही पर तुर्की पर संकट देख सभी बड़ी शक्तियो ने तुर्की की सरकार का समर्थन किया जिसने सैनिक भावनाओं को और कमजोर करने में मदद की
7. जन भावनाएँ-तुर्की के लोग इस्लामी विचारधारा से अधिक प्रभावित नहीं है इसी कारण आधुनिक परुवेश में भी ISIS तुर्की में घुसने में नाकाम रहा है साथ ही विकास की द्रष्टि से भी संपन्न है पर एरडोगन की पार्टी का झुकाव लोगो को पसंद नहीं आ रहा
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