28.6.17

भारत मे दलित समस्या और आरक्षण, कैसे आएगा सुधार, कब बदलेंगी सोच

लख़नऊ
आरक्षण को लेकर चल रही रस्सा कस्सी के बीच भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व सांसद विजय सोनकर शास्त्री जी ने Logicalnews के लिए लिखा अपना आर्टिकल, आखिर क्या है दलित समस्या और क्या है इसका इलाज , दलित संसय का एकमात्र उपाय इनको हिन्दू समाज मे आत्मसात करने का है, शिया-सुन्नी या प्रोटेस्टेंट- कैथोलिक जैसे अलग सम्प्रदाय बनाना कभी  नही हो सकता।
पढिये डॉ विजय सोनकर शास्त्री जी का ये लेख-

माइन्ड सेट बदले कैसे और कब तक..?

"आजकल के बच्चों को शेड्यूल कास्ट्स और शेड्यूल ट्राइब्स को आरक्षण क्यों दिया जाता है, यह स्पष्ट होना बहुत आवश्यक है। हम अपने आसपास के सामान्य वर्ग के बच्चों को यह कहते अक्सर सुन सकते हैं उनके स्थान पर दलित वर्ग के बच्चे को उनका हक दे दिया गया। इस प्रकार का वे अपना दर्द बयान करते है । उसके बयान के तह में जाना होगा और इस तरह के लाखों लाख बच्चे जो भ्रमित हैं, जिनके मन में दलित वर्ग के प्रति भ्रम है एवं जो शेड्यूल कास्ट्स,शेड्यूल ट्राइब्स को दिए गए आरक्षण को समझ नहीं पाए हैं, उन को समझाने कि चुनौती को स्वीकार करना होगा।
वे बच्चे यह जान ले कि दलित समस्या वास्तव में है क्या ? तो उन्हें यानी दलित वर्ग के लिए आदर और सम्मान के साथ उन्हें आत्मियता भी देंनें में पिछे नहीं हटेंगे।

इस संदर्भ में संक्षिप्त में मैं इतना कहना चाहूंगा कि दलित वर्ग के लोग गरीब, अशिक्षित अत्यंत पिछड़े ही केवल नहीं होते बल्कि वे अस्पृश्य एवं सामाजिक व्यवस्था में सबसे निम्न होते हैं।यह निर्धारन समाज ने किया है।उनके प्रति यह व्यवहार समाज ने सुनिश्चित किया है, जो उचित नहीं है। और यह अकारण एवं षड्यंत्रयुक्त लगता है। लगभग आठ सौ बर्षों से यह दुर्भाग्यपूर्ण कुकृत्य कुछ लोगों के साथ हुआ।स्वाभिमानी और धर्माभिमानी हिंदू योध्दाओ को उनके राष्ट्राभिमान और धर्माभिमान की सजा मुगल काल में उन्हें मिला। वे भी ब्राह्मण और क्षत्रिय ही थे।

उनका स्वभिमान और धर्माभिमान भंग करके उन्हें अस्वच्छ कार्य जैसे मैला ढोने एवं चर्म कर्म में लगाकर अस्पृश्य यानी अछूत बना दिया। आज आठ सौ बर्षों बाद दलित के रूप मे चिन्हित हैं।

आज सामान्य वर्ग में उनके प्रति जो स्थापित मानसिकता है , वह उन्हें निम्न समझते है जबकि इसका आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक इत्यादि समस्या से कोई लेना देना नहीं है।

वास्तव में एक ब्राह्मण भी निर्धन हो सकता है । आवास रहित हो सकता है। कपड़े का उसको भी आभाव हो सकता है, यानी मूलभूत आवश्यकता की वस्तुएं वस्तुओं से वंचित हो सकता है । और ऐसा ही अन्य जातियों की भी स्थिति है। परन्तु क्या कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या अन्य सामान्य वर्ग या जाति के लोग दलित हो सकते हैं ?

दलित का मतलब  सामाजिक व्यवस्था में निम्न एवं अस्पृश्य माना जाता है। यह सामान्य लोगों की स्थापित मानसिकता यानी माइन्ड सेट है। यदि यह बदल जाय तो आरक्षण का औचित्य ही समाप्त हो जाएगा। फिर दलितों को आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी।

जबतक समाज में आत्मियता स्थापित नहीं हो जाती,तब तक तो हमें प्रतिक्षा करना ही होगा। हमे अपने बच्चों को भी यह समझाना होगा। उनके भ्रम को तोड़ना ही होगा। उनके तथा समाज के माइन्ड सेट को बदलना ही होगा।समाज हित और देश हित में भी यह आवश्यक है। सादर।

नोट- लेखक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व सांसद है डॉ बिजय सोनकर शास्त्री के बारे अधिक जानने के लिए पढ़े - https://en.m.wikipedia.org/wiki/Bizay_Sonkar_Shastri
TheLogicalNews
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