21.2.18

2007 में हुए गोरखपुर दंगा मामले में आज आएगा फैसला, इस मामले में CM योगी गए थे जेल

 इलाहाबाद

गोरखपुर में साल 2007 में हुए साम्प्रदायिक दंगे के मामले में उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जाए या न चलाया जाए, इस बारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट गुरुवार को अपना फ़ैसला सुनाएगा.

मामले में योगी के अलावा कई अन्य लोग भी अभियुक्त हैं.हाईकोर्ट ने इस मामले में पिछले साल 18 दिसंबर को अपना फ़ैसला सुरक्षित कर लिया था. क़रीब 11 साल पहले गोरखपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए थे.

इस मामले में राज्य सरकार ने पहले आदित्यनाथ योगी को अभियुक्त बनाने से ये कहकर मना कर दिया था कि उनके ख़िलाफ़ कोई साक्ष्य नहीं हैं. बाद में मामले की सीआईडी क्राइम ब्रांच से जांच हुई और फिर सरकार की ओर से हाईकोर्ट में क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी गई.

लेकिन याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बिना किसी जांच और कार्रवाई के ही सरकार ने क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल कर दी. हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की और उस पर सुनवाई की.

याचिकाकर्ताओं के वकील SFA. नक़वी कहते हैं, "इस मामले में राज्य सरकार ने क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन हमारी इस आपत्ति के बाद कि सरकार के मुलाज़िम अपने ही मुख्यमंत्री के ख़की मांग कैसे करेंगे? कोर्ट ने सरकार से दोबारा जवाब तलब किया, सुनवाई पूरी हुई और अब फ़ैसले की घड़ी आ गई है. इसके अलावा CID क्राइम ब्रांच की बजाय किसी अन्य एजेंसी से भी जांच कराने की हमारी मांग है."

27 जनवरी 2007 को गोरखपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ था. आरोप है कि इस दंगे में दो लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे, CM योगी पर एक दरगाह जलाने का भी आरोप है,

इस मामले में दर्ज एफ़आईआर में आरोप है कि तत्कालीन बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ, गोरखपुर के विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की तत्कालीन मेयर अंजू चौधरी ने रेलवे स्टेशन के पास भड़काऊ भाषण दिया था और उसी के बाद दंगा भड़का था.

इस मामले में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के कई नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई थी. इन लोगों पर एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए गोरखपुर के एक पत्रकार परवेज़ परवाज़ और सामाजिक कार्यकर्ता असद हयात ने याचिका दाख़िल की थी.

परवेज़ परवाज़ बताते हैं, "मैंने अपनी आँखों से देखा था कि रेलवे स्टेशन के पास मंच पर ये लोग भाषण दे रहे थे और एक के बदले 10 मुसलमानों को मारने जैसी बातें कह रहे थे. तमाम साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद सरकार को कुछ भी नहीं मिला, ये समझ से परे है. इसीलिए शायद कोर्ट ने भी इनसे सब कुछ जल्द पेश करने को कहा."

FIR दर्ज होने के बाद सरकार ने मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे किसी अन्य एजेंसी को सौंपे जाने की मांग की थी. इस दौरान अंजू चौधरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने काफ़ी दिनों तक स्टे कर रखा था, लेकिन 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे वापस ले लिया.

इसी दौरान राज्य में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारें रहीं, लेकिन मामले की पैरवी में दोनों सरकारों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.,वहीं इस साल मार्च में बीजेपी सरकार बनने के बाद राज्य के मुख्य सचिव ने हाईकोर्ट से ये कहते हुए केस को बंद करने की मांग की कि जांच एजेंसी को कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिल सके.

हालांकि, उस वक्त यह सवाल उठा था कि गृह विभाग के अफसर अपने ही मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी कैसे दे सकते हैं. इसी का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने सरकार से दोबारा अपना पक्ष रखने का समय दिया है.

LogicalNews

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