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संयुक्त राष्ट्र संघ पर दिवालिया होने का खतरा, क्या खत्म हो जाएगी दुनिया की सबसे बड़ी संस्था?

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क्या संयुक्त राष्ट्र दिवालिया हो रहा है? दुनिया की सबसे बड़ी संस्था के सामने अस्तित्व का संकट

दुनिया में जब कोई युद्ध होता है, शरणार्थी संकट पैदा होता है, महामारी फैलती है या किसी गरीब देश को मानवीय सहायता की आवश्यकता होती है, तो सबसे पहले जिस संस्था की ओर देखा जाता है वह है संयुक्त राष्ट्र। लेकिन एक विडंबना उभर रही है। जिस संस्था से दुनिया समस्याओं का समाधान चाहती है, वह स्वयं गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही है। हाल के महीनों में संयुक्त राष्ट्र के कई विभागों ने चेतावनी दी है कि सदस्य देशों द्वारा योगदान में देरी और धन की कमी के कारण कर्मचारियों की नियुक्तियाँ रोकी जा रही हैं, कार्यक्रमों में कटौती की जा रही है और कुछ मानवीय अभियानों पर भी दबाव बढ़ रहा है। यह केवल बजट का मुद्दा नहीं है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का प्रश्न है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई थी।

समस्या की जड़ संयुक्त राष्ट्र के वित्तीय मॉडल में छिपी है। संगठन का अधिकांश बजट सदस्य देशों के योगदान पर निर्भर करता है। अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और कुछ अन्य बड़े देश इसका बड़ा हिस्सा देते हैं। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया अधिक ध्रुवीकृत होती गई है, वैसे-वैसे कई देशों में यह प्रश्न उठने लगा है कि वे इतनी बड़ी राशि क्यों दें जबकि संयुक्त राष्ट्र उनकी प्राथमिकताओं के अनुरूप परिणाम नहीं दे पा रहा। कुछ देशों ने भुगतान में देरी की, कुछ ने स्वैच्छिक फंडिंग कम की और कुछ ने विशेष कार्यक्रमों के लिए धन रोक दिया। परिणामस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र की नकदी स्थिति बार-बार संकट में पहुँच रही है। कई बार संस्था के पास अपने कर्मचारियों का वेतन और संचालन खर्च चलाने के लिए भी सीमित संसाधन बचे हैं।

यह संकट केवल अकाउंटिंग का मामला नहीं है। दुनिया आज ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहाँ युद्ध, जलवायु परिवर्तन, प्रवासन, खाद्य सुरक्षा और महामारी जैसे मुद्दों पर पहले से अधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व संकट, अफ्रीका में मानवीय आपातकाल और जलवायु आपदाओं ने संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को और महत्वपूर्ण बना दिया है। लेकिन उसी समय उसकी वित्तीय क्षमता कमजोर पड़ रही है। यह ऐसा है जैसे किसी शहर की आबादी और समस्याएँ दोनों बढ़ती जाएँ, लेकिन नगर निगम का बजट घटता चला जाए। संस्था से अपेक्षाएँ बढ़ रही हैं, पर संसाधन नहीं।

भारत के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है। भारत लंबे समय से एक मजबूत, अधिक प्रतिनिधिक और सुधारित संयुक्त राष्ट्र की वकालत करता रहा है। यदि संयुक्त राष्ट्र वित्तीय रूप से कमजोर होता है, तो विकासशील देशों की आवाज़ और मानवीय कार्यक्रम दोनों प्रभावित हो सकते हैं। भारत अफ्रीका, एशिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ मिलकर बहुपक्षीय संस्थाओं को मजबूत करने की बात करता है, क्योंकि आने वाले दशकों में जलवायु वित्त, विकास सहायता, शांति मिशन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका और बढ़ने वाली है। ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र के पास पैसा है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या 1945 में बनी वैश्विक व्यवस्था 2045 की दुनिया की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को बदल पाएगी?

LogicalNews Insight

संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय परेशानी वास्तव में एक बड़े बदलाव का संकेत है। दुनिया धीरे-धीरे उस युग से बाहर निकल रही है जहाँ वैश्विक संस्थाओं पर सर्वसम्मति आधारित भरोसा था। अब राष्ट्र पहले अपने हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं और बाद में वैश्विक संस्थाओं को।

यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो भविष्य में दुनिया के सामने केवल युद्ध या जलवायु संकट का खतरा नहीं होगा। एक और खतरा होगा: वैश्विक संस्थाओं का कमजोर पड़ना।

और इतिहास बताता है कि जब समस्याएँ वैश्विक हों लेकिन संस्थाएँ कमजोर हों, तब दुनिया अधिक अस्थिर, अधिक खंडित और अधिक अप्रत्याशित बन जाती है।

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