गोरखपुर उपचुनावों को लेकर सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं सीएम योगी अखिलेश यादव कई भाजपा नेता बराबर चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं, पिछले 29 सालों से यहां के सांसद का पता गोरखनाथ मंदिर का रहा है. साल 1998 से लगातार पांच बार इस सीट से योगी आदित्यनाथ निर्वाचित हुए. उनसे पहले उनके गुरु और श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अगुआ रहे महंत अवैद्यनाथ 1989 से लगातार तीन चुनावों में यहां का प्रतिनिधित्व करते थे.शायद इसीलिए इस बार का चुनाव बेहद ख़ास हो गया है .
BJP की शाख का प्रश्न-
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी ये साबित करने में जी जान से जुटी है कि परंपरागत रूप से मंदिर के प्रभाव वाली ये सीट योगी के उम्मीदवार न रहने के बावजूद पार्टी के पास ही रहेगी,
मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में वो पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं. राष्ट्रीय राजनीति में कर्नाटक से लेकर त्रिपुरा तक के चुनावों में पार्टी की ओर से प्रभावी इस्तेमाल के बाद उनकी छवि और कद में इजाफा हुआ है. ऐसे में उनके लिए अपनी परंपरागत सीट पर पार्टी को प्रभावशाली जीत दिलाना बेहद जरूरी है.
कांग्रेस का दावा
कांग्रेस ने यहां से पेशे से चिकित्सक और सामाजिक रूप से बेहद सक्रिय डॉक्टर सुरहिता करीम को अपना प्रत्याशी बनाया है.मूल रूप से से बंगाली हिन्दू समुदाय से ताल्लुक रखने वाली सुरहिता चटर्जी के पति डॉ वजाहत करीम एक मशहूर चिकित्सक और फिल्म निर्माता के तौर पर अपनी पहचान रखते हैं पर उनको LOVE जिहाद की निशानी मान रहे लोग अब वोट देने से रहे
सपा- बसपा का समीकरण
पिछले हफ्ते 23 साल से प्रदेश की राजनीति में एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी रही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अचानक गठजोड़ ने मामले में नाटकीय मोड़ ला दिया है.
गोरखपुर संसदीय सीट के 19 लाख 50 हज़ार वोटरों में निषादों की संख्या लगभग 3,50000 के बीच बताई जाती है, अगर इनके साथ लगभग 8% दलित (खास कर जाटव) वोटर और 9% मुस्लिम वोटर व 10% यादव आ जाएं तो चुनाव जीतना BJP के लिए असंभव होगा।
समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रवीण निषाद इस इलाके में बहुत कम समय में काफी तेजी से उभरी निषाद पार्टी के संयोजक डॉ संजय निषाद के बेटे हैं जिन्होंने पिछले दिनों पिछड़े मुसलमानों में गहरी पैठ रखने वाली पीस पार्टी के साथ मिलकर अब सपा का दामन थाम लिया है.मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढाई कर चुके प्रवीण निषाद पिता की तरह ही छापामार किस्म की लडाइयों के शौक़ीन दिखते हैं जिसमें सुर्खियाँ आसानी से हासिल होती हैं.
क्या कह रहे है लोग-
मंगलवार की सुबह परिवार सहित गोरखनाथ मंदिर पहुँच कर गोरक्षनाथ के गुरु रहे मछेंदर नाथ की मूर्ति के सामने माथा नवाने वाले प्रवीण ने LogicalNews से कहा, "एक हिंदू धर्मानुयायी होने के नाते आशीर्वाद मांगने का अधिकार तो सबको है" जब हमने उनसे अपनी राजनीतिक पसंदके बारे में पूछा तो उनका कहना था कि मंदिर में श्रद्धा है पर वोट देना जरूरी नही योगी होते हो अलग बात थी,
मंगलवार की सुबह परिवार सहित गोरखनाथ मंदिर पहुँच कर गोरक्षनाथ के गुरु रहे मछेंदर नाथ की मूर्ति के सामने माथा नवाने वाले प्रवीण ने LogicalNews से कहा, "एक हिंदू धर्मानुयायी होने के नाते आशीर्वाद मांगने का अधिकार तो सबको है" जब हमने उनसे अपनी राजनीतिक पसंदके बारे में पूछा तो उनका कहना था कि मंदिर में श्रद्धा है पर वोट देना जरूरी नही योगी होते हो अलग बात थी,
हालांकि बसपा के कोआर्डिनेटर घनश्याम खरवार ने LogicalNews से कहा, "बहनजी के अनुशासित कार्यकर्ता उनके आदेश के बाद पूरी ताकत से सपा प्रत्याशी के प्रचार में जुट गए हैं. दरअसल विपक्षियों को 1999 का लोकसभा चुनाव दोहराने की उम्मीद है जब निषादों के कद्दावर नेता रहे जमुना निषाद ने निषाद,मुस्लिम और यादव वोटों के बूते योगी आदित्यनाथ को बेहद कड़ी टक्कर दी थी. उस चुनाव में योगी की जीत का अंतर महज सात हज़ार वोटों तक सिमट गया था.
उन्हें लगता है कि इस बार योगी के प्रत्याशी न होने से ये खाई भी पट जायेगी.लेकिन भाजपा भी आश्वस्ति के शिखर पर है.
कहाँ गया हिंदुत्व कार्ड-
जिस हिंदुत्व कार्ड की बदौलत पिछले 35 सालों से गोरखनाथ मंदिर का आचार्य महंत अथवा मंदिर से जुड़े व्यक्ति चुनाव जीते रहे थे वह हिंदुत्व का इस चुनाव में खास महत्व नहीं रख रहा है यह बात विशेष रूप से सोचने लायक है कि ऐसा क्यों हुआ हमने जब लोगों से बात की तो यह महसूस हुआ की मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी जी द्वारा हिंदू युवा वाहिनी को बराबर इग्नोर किए जाने की बात इस बार के चुनावी चर्चा में है जिसके कारण लोग इस चुनाव को हिंदू vs मुस्लिम की नजर से नहीं देख रहे हैं अथवा सर्कुलर वर्सेस हिंदुत्व का कार्ड काम नहीं कर पा रहा है जबकि अभी सिर्फ एक साल हुआ है ।
जिस हिंदुत्व कार्ड की बदौलत पिछले 35 सालों से गोरखनाथ मंदिर का आचार्य महंत अथवा मंदिर से जुड़े व्यक्ति चुनाव जीते रहे थे वह हिंदुत्व का इस चुनाव में खास महत्व नहीं रख रहा है यह बात विशेष रूप से सोचने लायक है कि ऐसा क्यों हुआ हमने जब लोगों से बात की तो यह महसूस हुआ की मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी जी द्वारा हिंदू युवा वाहिनी को बराबर इग्नोर किए जाने की बात इस बार के चुनावी चर्चा में है जिसके कारण लोग इस चुनाव को हिंदू vs मुस्लिम की नजर से नहीं देख रहे हैं अथवा सर्कुलर वर्सेस हिंदुत्व का कार्ड काम नहीं कर पा रहा है जबकि अभी सिर्फ एक साल हुआ है ।
LogicalNews का निष्कर्ष
वर्तमान परिस्थितियों में गोरखपुर में आज के न्यूज़ इस निष्कर्ष पर निकली है वह यह दिखाता है कि हम से मिलने मैं वाले 10 मैसेज 7 व्यक्तियों ने BJP को या भाजपा प्रत्याशी को वोट न देने में रुचि अधिक है अतः योगी जी के द्वारा की गई जनसभा को और सरकार के कार्यों का कोई खास असर नहीं पड़ता दिख रहा है ऐसे में यदि भाजपा चुनाव हारती है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी लोगों को लगता है कि योगी जी खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं तो वह सपा को वोट देने के लिए स्वतंत्र हैं साथ ही योगी जी के द्वारा की गई मेहनत पर ही पूरा प्रणाम टिका है यदि योगी जी जनता को भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में करने में सफल होते हैं तो चुनाव जीतने की संभावना है परंतु फिर भी हमें लगता है कि यह चुनाव अगर बीजेपी जीतती है तो भी अंतर बहुत कम होगा
LogicalNews
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